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#कविता - पथ

पथ पथ पर रुकता हूँ मैं
आगे चलने के लिए।
रुक कर चलने से

कभी हार नहीं होती।

पथ पर गिरता 
हूँ मैं

उठता हूँ मैं। 
गिर के उठने से

कभी हार नहीं होती।

पथ पर हजारो अड़चने है 

अड़चनो से लड़ता हूँ मैं।
अड़चनो से लड़ने पर 

कभी हार नहीं होती।

कभी अकेले तो 

कभी भीड़ में चलता हूँ मैं।
अकेले या भीड़ में चलने से 

कभी हार नहीं होती।

जीवन एक सरल प्रक्रिया है

इसमें हजारो उलझने है
उलझनों को सुलझाने से 

कभी हार नहीं होती।

कर्म करता हु मै

मेहनत करता हूँ मैं
कर्म और मेहनत करने से 

कभी हार नहीं होती

पथ पथ पर रुकता हूँ मैं 

आगे चलने के लिए।
रुक कर चलने से 

कभी हार नहीं होती। 

टिप्पणियाँ

  1. वाह....बहुत खूब भाई ...
    पथ पर गिरता हूँ मैं
    उठता हूँ मैं।
    गिर के उठने से
    कभी हार नहीं होती......


    गजब लिखा भाई ..

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