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फिरोज-रंजन का धर्म

फिरोज और रंजन पुरानी बस्ती के मोहल्ले मे रहते थे। दोनो की उम्र समान ही होगी है, यही कुछ १० दिन का फरक होगा। जहां तक मुझे याद है रंजन का जन्म बकरीद के दिन हुआ था और फिरोज का जन्म धनतेरश दिवाली को हुआ था। दोनों के घर खुब खुशियाँ मनाई गई थी। हमने भी खूब दावात खाई दोनों के घर पर, लेखक आदमी तो मुफ्त की रोटी ढूंढता ही रहता है। फिरोज और रंजन का नाम पुरानी बस्ती के सरकारी स्कूल मे लिखवा दिया गया । दोनो पहली कक्षा मे पढ़ते थे। एक से कपड़े पहनकर स्कूल जाना और साथ बैठ कर घरकाम करना, शाम को साथ खेलना। दोनो की दोस्ती ऐसी की एक को मारखाते हुए देख दुसरा रोने लगता था​। दोनों एक दूसरे को भाई समझते थे।

रमजान ईद के दिन फिरोज खीर से भरी हुई कटोरी लेकर रंजन के घर आया। फिरोज के हाथ में खीर का कटोरा देखकर रंजन की मां थोड़ा सकुचाई, इससे पहले फिरोज के घर से कभी कुछ खाने को नहीं आया था। रंजन जैसे ही खीर की तरफ बढ़ा उसकी मां ने खीर की कटोरी थाम ली। फिरोज भी खीर देकर चला गया, उसे आज कई लोगों के घर जाना था। फिरोज के जाने के बाद रंजन की मां ने खीर को उठाकर कचरे के डब्बे मे डाल दिया। रंजन को ये बात नहीं समझी, पूछने पर माँ ने बताया की हम हिन्दू, मुसलमान के छूई जमीन पर पांव नहीं रखते तो उनके घर की खीर खाना तो दूर की बात है। रंजन इस बात को ज्यादा समझ नहीं पाया परन्तु उसे ये पता चल गया था की उसका और फिरोज का धर्म अलग है।

फिरोज रोज शाम को रंजन के साथ मंदिर जाता था और मंदिर से प्रसाद लेकर घर आ जाता था। लेकिन अब धीरे - धीरे फिरोज के मंदिर जाने पर रोक लगा दी गयी। फिरोज रोज अपने अम्मी और अब्बू से छुपकर मंदिर जाने लगा और प्रसाद खा कर चुपचाप घर ​आने  लगा। फिरोज हर बार होली में रंजन के साथ खूब धूम धड़ाका करता था लेकिन इस बार फिरोज को उसके अब्बू ने होली खेलने से मन कर दिया। फिरोज के जिद्द करने पर भी उसे होली खेलने को नहीं मिली। अब्बू ने फिरोज से कहा की हम इस्लाम धर्म के है और इसलिए हम होली नहीं खेल सकते है। फिरोज को भी इतनी छोटी उम्र में मजहब का पाठ पढ़ा दिया गया। फिरोज और रंजन की नन्ही उम्र में ही उनके बीच एक दीवार बन गई।

​ए बात २० साल पहले की है। तब से आज तक हिन्दू मुसलमान के बीच कई दंग्गे हुए। यकीन से नहीं कह सकता परंतु सुनने में आया था की अयोध्या मंदिर - बाबरी मस्जिद दंग्गे के बाद, कभी एक दूसरे के दर्द से रोने वाले फिरोज और रंजन, एक दूसरे के खिलाफ तलवार लेकर खड़े थे और दोनों ने एक दूसरे धर्म के कई लोगो को जान से मार दिया। पुलिस के कर्फ्यू लगाने के बाद भी फिरोज और रंजन कत्ले आम कर रहे थे और पुलिस के गोली से मारे गए। प्रायः धर्म के नाम पर कत्ले आम करने वाले को यही हाल होता है लेकिन​ फिरोज-रंजन का जन्म से तो ऐसे नहीं थे लेकिन हमने और हमारे समाज ने उन्हें धर्म और मजहब के पाठ पढ़ाया। 


​आप लोगो ने ये वीडियो कई बार देखा होगा लेकिन आज फिर देख लेना। 



अगले सोमवार फिर मिलेंगे एक नई रचना के साथ। अपनी पुरानी बस्ती में आते रहना।

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टिप्पणियाँ

  1. एक बार कौए के बच्चे ने अपने बाबा से कहा, बाबा आज मुझे इन्सान का माँस खाना है! क्या ये बोहत मुश्किल से मिलता है? उसके बाबा ने कहा बेटा चलो तुझे इन्सान का शिकार करना सिखाता हुँ! वो उसको कचरे के ढेर से एक माँस का टुकडा उठा कर बोला, देखो इन्सान बडी ही छोटी मान्सिकता वाला प्राणी है! इसलिए उसका शिकार मछली के शिकार से भी आसान है! और यह कह करकर वो माँस के दो टुकडे किये और एक टुकडा मंदिर के आँगन में और दूसरा महजिद के आँगन मे डाल दिया! और अपने पोते "कोए" के साथ पेड पर जा बैठा!

    महजिद में नमाज का समय होने वाला था, नमाज़ियों की भीड आने लगी! जैसे ही माँस का टुकडा देखा बिन सोचे लोग बोल पडे अरे हिंदुओं ने सुअर का माँस हमारी नमाज खराब करने के लिए यहाँ डाला है! चलो हम इनको काट कर मंदिर के आगे डालते हैं!

    उधर मंदिर के सामने भी सुब्ह की आरती का समय था! वहाँ भी लोगों ने इस माँस ते टुकडे को देख कर कहना चालू किया की किसी मुस्लिम ने गाय का माँस हमारी आरती में विध्न डालने के लिए डाला है! चलो हम उनको काट कर महजिद के सामने डाल देते हैं!

    बस फिर क्या था? दोनों धर्म के अनुयायी आपस नें भीड गए! इस पर कोए के बच्चे ने पूछा की बाबा ये आपस में एक दूसरे को क्यों मार रहे है?

    कोए ने जवाब दिया: "बेटा ये दोनों धर्म को तो मानते हैं! पर धर्म की नहीं मानते"!

    बस फिर लाशों के ढेर लगे देख कोए ने कहा, जो अपनी प्रजाती का सम्मान नहीं करता! उसको शिकार करना उतना ही आसान हो जाता है!

    -दिनेश चौधरी TL @dineshsourot
    Www.mypoetrydiary4you.com

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    1. Ji.. aur ye kauve hamaare samaaj/politics me bahot ghoose huve hai; inko nikaal baahar karana jaruru hai. saaf safaai shuru ho gai hai, jaari rahegi. :-)

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    2. धन्यवाद दिनेश। आपकी इस लघु कहानी से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला

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  2. काश लोगों की नजरों से ये मजहब का परदा उठ जाए तो इसी नीले आसमान के तले फिर से कोई रंजन और फिरोज को मजहब के नाम पर न बांटेगा...........ऐसे प्रेरक लेख के लिए तारीफ़ में क्या कहें शब्द नहीं .......

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    1. मजहब का पर्दा उठाने के लिए, मानव धर्म का निरमन करना होगा

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