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कैलाश की दिवाली

मोहल्ले के सभी बच्चे तीन दिन से दिवाली मना रहे थे। कैलाश भी दिवाली मनाना चाहता था, परंतु माँ उसे पटाखे खरीदने के लिए पैसा नहीं दे रही थी। माँ पैसे कहाँ से देती लोगो के घर झाड़ू पोछा करके जो पैसा मिलता था, उससे घर चलाना भी मुश्किल हो जाता था। महीने के अंत तक खाने पिने के भी लाले पड़ जाते थे। कैलाश को ये बाते समझ में नहीं आती थी, उसे सिर्फ दिवाली में पठाखे जलाने के लिए चाहिए थे। माँ भी कैलाश को खुश देखना चाहती थी परन्तु पैसे की मजबूरी के आगे कुछ नहीं कर पाती थी।

दिवाली के दिन कैलाश घर के पास वाले वाले मैदान में खेल रहा था। दोपहर को घर आया और खाना खाकर फिर से खेलने चला गया। माँ सोच रही थी की शायद आज पटाखों का बुखार उसके सर पर नहीं है। माँ खुश हो गयी और काम पर चली गयी। दिवाली का दिन था तो काम रोज से ज्यादा था. माँ भी जल्दी जल्दी काम निपटाकर घर जाना चाहती थी। दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजा करके लक्ष्मी माँ को मनाना चाहती थी। लक्ष्मी माँ गरीबो से इतना क्यों रूठी रहती है ये जानना चाहती थी। लेकिन सुना है की बिना देशी घी के दिये के लक्ष्मी माँ नहीं माननेवाली। कैलाश के घर में तो खाने का तेल नहीं था तो घी का दिया जलाना तो दूर-दूर तक संभव नहीं था।

माँ काम ख़तम कर के घर आयी तो कैलाश झट से आकर माँ से चिपक गया। माँ ने कैलाश को हाथ पांव धोने के लिए कहा और पूजा की तैयारी में जूट गयी। खोटे जी के यहाँ से माँ को दिवाली के 30 रुपये मिले थे और माँ ने उन पैसो से दीयाँ, तेल और शक्कर की मिठाई खरीद ली। पूजा के बाद कैलाश ने मिठाई खा ली और फिर से फटाखो के लिए जिद करने लगा। माँ भी कैलाश की हर मांग को पूरा करना चाहती थी पर मजबूर थी। कैलाश नहीं मान रहा था और जिद कर रहा था। माँ ने गुस्से में आकर कैलाश को दो थप्पड़ जड़ दिए और कैलाश रोते रोते सो गया और माँ भी एक तरफ रोते रोते सो गयी।

कैलाश की दिवाली दिल दुखा देनेवाली थी परन्तु आज भी भारत में कई ऐसे कैलाश है जो दिवाली के दिन रोते रोते सो जाते है। भगवान ने यदि आपको इस लायक बनाया है की आप किसी कैलाश की दिवाली में खुशियां भर सकते है तो ऐसा जरूर करना। किसी के चेहरे  की मुसकान से आपको जो दुवा मिलेगी वो आपकी ज़िंदगी को सुख और शांति प्रदान करेगी। हमारा भी समाज के प्रति एक कर्तव्य है और हम सब को उस कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। हमारे वेदो में भी आय के दसवें हिस्से को दान करने के लिए कहा गया है तो इस दिवाली कुछ दान धर्म भी कर देना और रोते हुए कैलाश को हँसा देना। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. काश ये हमारी दीपावली कभी पाठखो की संस्कृति से बहार निकल तमसो माँ ज्योतिगर्मय वाली बने फिर कोई कैलाश न रोयेगा

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