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मेरा क्रिसमस गिफ्ट

मुंबई, १९९५ ​

मै ​बारह साल का था और सातवी कक्षा ​में पढ़ रहा था​।​ मै हिंदी माध्यम ​में पढता ​था ​और ​इस लिए क्रिसमस मेरे लिए एक दिन की छुट्टी के अलावा कोई ​ज्यादा महत्व नहीं रखता था​ I अंग्रेजी माध्यम मे क्रिसमस के उपलक्ष्य मे एक हप्ते की छुट्टिया ​मिलती थी, परन्तु अन्य भाषा के विद्यालयों मे एक दिन के अवकाश के अलावा क्रिसमस कोई खास मायने नहीं रखता था। मुझे तो पहली कक्षा से ही क्रिसमस की छुट्टिया मिलती थी परन्तु क्रिसमस का मतलब मुझे सातवी कक्षा मे समझ मे आया। ​

क्रिसमस ईसायियो का बहुत बड़ा त्यौहार था जैसे हिन्दू धर्म मे दिवाली होता है, मेरे लिए उत्सुकता की बात ये थी की मेरे मित्रो के अनुसार क्रिसमस के दिन सेंटाक्लॉस​ नाम का व्यक्ति आता है और सबको गिफ्ट देकर जाता है। ​मेरे मित्रो ने बताया की ​सेंटाक्लॉस गिफ्ट लोगो के मोज़े मे डालता ​है। ​तो इस बार मैंने भी टाक्लॉस से गिफ्ट लेने की ठान ली।

क्रिसमस के दिन सुबह उठकर मैं सबसे पहेले अपने मोज़े को धोने लगा । ​मै नहीं चाहता था की सेंटाक्लॉस मेरे गंदे मोज़े मे गिफ्ट डालकर जाए और शाम के समय मैंने अपने मोज़े को अपने बिस्तर के किनारे टांग दिया। मै मन ही मन सोच रहा था की इतने छोटे से मोज़े में सेंटाक्लॉस क्या डालेगा, यही सोचते-सोचते मै सो गया और सुबह उठकर मैंने सबसे पहेले अपने मोज़े की तरफ नज़र डाला परन्तु मेरा मोजा जगह पर नहीं था मै परेशान हो गया और जैसे ही उठकर बाहर आया मेरा मोजा बाहर की रस्सी पर ​सूख रहा था। मेरी माँ ने उस धुले​ हुए मोज़े को फिर धोकर रस्सी पर टांग दिया​ और मैं माँ के ऊपर नाराज होकर जोर जोर से रोने लगा। माँ ने मुझे डांट लगाकर नहाने भेज दिया।

मैंने ​इस घटना के बाद ​एक साल तक क्रिसमस का इंतज़ार किया और​ फिर से क्रिसमस का दिन आ गया​,​ इस बार मैंने आपने पिताजी का नया मोजा लिया क्योंकि बड़े और नए मोज़े मैं सेंटाक्लॉस कुछ बड़ा ही डालेगा। मैंने मोजा ऐसी जगह रखा ​जहा सेंटाक्लॉस के अलावा कोई नहीं पहुच पाए। मै दिन भर खेल रहा था तो रात मै जल्दी सो गया । सुबह उठकर झटपट मै मोज़े को उतारने के लिए चला गया​ लेकिन जैसे ही मैंने मोज़े को खोला​ तो वो खाली था मुझे इस बात का दुःख हुआ की मैंने मोजा ऐसी जगह क्यों टांगा जहाँ किसी की नजर न जाए, मुझे लगा शायद सेंटाक्लॉस को भी मोजा ढूढ़ने में परेशानी हुई इसलिए वो बिना गिफ्ट डाले ही चला गया। 


कुछ सालो के बाद। मुझे पता चला की क्रिसमस के दिन बच्चो के माता पिता उनके लिए गिफ्ट लाते है और ​सेंटाक्लॉस सिर्फ एक दन्त कथा है। मेरे माता पिता इस बात से अनभिज्ञ थे हमारे हिन्दू धर्म मै क्रिसमस का कोई रिवाज़ नहीं था। मैं हमेशा आपने क्रिसमस की इस कहानी को सोच कर मुस्कराता हु और मन ही मन सोचता हु की किसी दिन मुझे क्रिसमस गिफ्ट मिलेगा परन्तु अब मैंने मोजा लटकाना छोड़ दिया हैI

इस लेख को शशिथरूर भी सराह चुके है। 

- अगले सोमवार फिर मिलेंगे एक नई रचना के साथ। अपनी पुरानी बस्ती में आते रहना।
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20 टिप्‍पणियां:

  1. इस ठण्ड में अपने घर में गर्म रजाई में आँख खुल जाना ही कभी कभी क्रिसमस गिफ्ट जैसा होता है

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    1. बात सही है परंतु बचपन में ये सब ना था

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  2. बचपन की चंचल सोच ; अच्छा लगा पढ़ के !!

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    1. धन्यवाद सुजीत, मैं स्वयं कई बार पढ़ चुका हूँ

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  3. बहुत सुन्दर .बचपन की यादें कभी-कभी चेहरे पर मुस्कराहट ला देती हैं.
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    1. सही कहा राजीव जी, बचपन की यादें हमेशा मीठी होती हैं

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  4. बाल मन जो सुनता है उस पर जल्दी विश्वास कर लेता है, क्योंकि बच्चों का मन मासूम और साफ होता है। बालपन की सच्ची घटना का सच्चे शब्दों से वर्णन किया है आपने। शुभकामनायें।

    -ज्योत्सना खत्री

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  5. वो चुपके से जरूर आएगी मिलने मुझसे….
    हकीकत नही तो “सपने” मे ही सही…

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  6. बच्चे मन के सच्चे होते हैं।अच्छी है। दिल को छू लेने वाली। @gapagapdotcom

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  7. @PuraneeBastee पढ़ कर अच्छा लगा. बाल मन की व्यथा via @dksardana muze bhi.. :-)

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