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फिल्म - अनुभव - आँखों देखी

बाबूजी (संजय मिश्रा) के इर्द गिर्द कई पतले-पतले महीन रेशम के धागो को जोड़कर रजत कपूर ने एक फिल्म बनाई "आँखों देखी". . . . दिल्ली के मध्यम वर्गीय परिवार की एक कहानी जिसमे दो भाई है दोनों शादीशुदा है और बड़े भाई अर्थात अपने बाबुजी के दो बच्चे है और बाबूजी के छोटे भाई का एक बेटा है। फिल्म के हर एक दृश्य में आपको अपना या अपने अगल बगल का परिवार दिखेगा जो आपसे बाते करने को तैयार है। बाबूजी की बेटी एक लड़के से प्यार कराती है लेकिन हर कोई उस लड़के को लफंगा समझता है। उस लड़के से मिलने के बाद बाबुजी के मन में संघर्ष शुरू होता है की लोगो की बातो को माने या अपने अनुभव से मिली जानकारी को सत्य माने। 

"मेरा सत्य वाही होगा जिसे मै महसूस करूँगा", इस चक्कर में बाबूजी अपनी नौकरी छोड़ देते है और अपना सच ढूंढने निकल जाते है। बाबूजी के नौकरी छोड़ते ही उनके छोटे भाई और उसकी धर्म पत्नी का व्यवहार बाबुजी के परिवार के प्रति बदल जाता है और वो भाड़े पर दूसरे घर में रहने चले जाते है। आज का समाज न तो स्त्री प्रधान है न तो पुरुष प्रधान है, ये समाज सिर्फ और सिर्फ धन प्रधान है। दो समांतर रेखाए एक दूसरे से कभी नहीं मिलती है और यदि मिली भी तो अनन्तता पर मिलती है। मतलब समांतर रेखाए मिलती है या नहीं मिलती है? कुछ ऐसे ही बेहतरीन शब्दों के साथ फिल्म की परिस्थितिया पूरी फिल्म में आपको गुदगुदाती रहेंगी। 

बाबूजी अपने सच की तलाश में कई ऐसी घटनाक्रम से गुजरते है जो आप और मै सोच भी नहीं सकते है। फिल्म भावनाओं के दरिया में आपको बहाती चली जाती है। ऐसा लगता है आप एक अन्नत शुन्य में गोते खा रहे है और बाबूजी की नजर से एक नया सत्य अनुभव कर रहे है। संजय मिश्रा ने जिस भोले पन से बाबूजी के किरदार को पर्दे पर जीवंत किया है वो लाजवाब और काबिले तारीफ है। रजत कपूर ने हमेशा से कुछ अलग करने की कोशिश की है और आँखों देखी ने उनकी इस कोशिश को सार्थक किया है। बॉलीवुड में बनी कुछ लाजवाब फिल्मो में से ये वो एक फिल्म है। फिल्म की सादगी उसे आने वाले कई वर्षो तक संजीदा रखेगी। फिल्म देखते-देखते दो बार मुझे बहुत गुस्सा आया पहली बार जब बाबूजी का छोटा भाई घर छोड़कर चला जाता है और दूसरी बार 

"कुछ अनुभव अभी भी बाकि है,
जो की सिर्फ सपनो में भगो थे 
जैसे की ये सपना मुझे बार आता था,
की मैं हवा में उड़ रहा हूँ,
पंक्षी के जैसे,
लेकिन ये सपना नहीं है ये वास्तविकता है, 
ये हवा जो मेरे चहरे को चूम रही है,
ये सांय सांय की आवाज मेरे कानो में,
ये यथार्थ है, सच है,
मै वाकई गगन को चीरता चला जा रहा हूँ,
चला जा रहा हूँ,
ये सपना नहीं है 
मैं उड़ रहा हूँ,
मैं उड़ रहा हूँ।"

बाबूजी ने अपने अनुभव से अपने सच को ढूंढ निकाला। मेरे अंदर जल रहा गुस्सा इस बात को दर्शाता है की मैं भी बाबूजी के किरदार से जुड़ गया था और उनके सच ढूंढने के अनुभव में शामिल होना चाहता था।  



टिप्पणियाँ

  1. bahot sawalon ke sath cchhod jati hai ye film...kuch sawaal khud se to kuch apne kartavyon se. sanjay ji ne middle class ko badi khoobsurati se uatara hai parde par. waqai kabil-e- tareef..

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