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दीपावली - #together

मुंबई में कई साल रहने के बाद ये तो पता था कि यहाँ कि दिवाली में शोर शरबा एक आम बात हो गई थी। परंतु मित्रो से मिलना लोगो के घर जाकर मिठाई खाना इन सबका अपना मजा था। लेकिन फिर भी दिवाली में कुछ तो कमी सी हर बार लगती थी। अचानक से एक दिन ऑफिस में बताया गया कि इस बार दिवाली पर ऑफिस पुरे ८ दिन बंद रहेगा। अब ७ दिन की छुट्टी मुंबई में बिताना सही नहीं लगा तो इसलिए गांव की टिकट बुक करवा ली। 

मुंबई छत्रपति शिवजी टर्मिनस से गांव पहुँचने तक का सफर ३० घंटे का था। अपने साथ कुछ किताबे रखकर सफर की शुरवात हो गई। हर स्टेशन पर उतरना और वहा के स्टेशन के यात्रियों को चढ़ते-उतरते देखना और उनकी एक एक बातों को नोटिस कर रहा था। लिखने के कारण एक बहुत ही बुरी आदत पड़ गई है, ना चाहते हुए भी आस पास के लोगो की सभी हरकते और घटनाएँ अपने आप दिमाग के किसी कोने में रिकॉर्ड होती रहती है। बनारस पहुंचकर वहा से बस लेकर मैं गाँव पहुंच गया। 

अपने गाँव पहुँचने का जो मजा है वो शायद ही किसी और जगह पहुँचने पर मिलता है। घर पर दिवाली की तैयारी शुरू थी। करंजी और शक्कर पारा बनाया जा रहा था। मैं पहली बार दिवाली में गांव आया था तो मुझे कुछ कुछ मुंबई के शोरे शराबे के याद भी आ रही थी लेकिन अपने गांव की मिट्टी और लोगो से मिलने का जो आनंद था वो एक अलग ही अनुभव था। गांव में हर बड़े बूढ़े को दिन में एक बार मिलने पर नमस्कार करना गांव की परंपरा का एक हिस्सा है और उसका भी अलग मजा है। 

दिवाली की रात गांव में सभी घर के ऊपर दीपों की लड़ी जल रही थी। छत पर खड़ा होकर चारो तरफ देखने पर ऐसा लगता था जैसे कोई एक सुंदर गीतमाला जल रही हो। गाँव के दीपावली की सबसे अच्छी बात ये थी कि वहा पर रात को कोई भी फटाखे की आवाज नहीं थी। उस शांत वातावरण में जलती दीपमाला को निहारने का सुखद अनुभव हमेशा मेरे दिल में रहता है। एक बार फिर कभी कोशिश करूँगा की दीपावली में गांव पंहुचा जाये। 

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