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#कविता - सत्य हूँ मैं












सत्य हूँ मैं,
शहर के फुटपाथ पर मिलता हूँ।
अब पुरानी रद्दी की दुकानों पर 
बिकता हूँ।

तुम सोचते हो,
मैं अखबारों में छपता हूँ।
लेकिन मैं वहां सच्चाई के नाम पर छपता हूँ।

मै हमेशा झूठे लोगो को दुःख पहुंचाता हूँ

इसलिए मैं लोगो की जुबान पर,
अब कम ही आता हूँ।

मैं अब झूठ के साथ दौड़ लगता हूँ।
वो अक्सर जीतता,
मैं हर जाता हूँ।

मैं धीरे धीरे झूठ में घुलता जाता हूँ।
शक्कर की तरह,
पानी में विलुप्त हो जाता हूँ।

सत्य हूँ मैं,
शहर के फूटपाथ पर मिलता हूँ।
अब पुरानी रद्दी की दुकानों पर 
बिकता हूँ। 

टिप्पणियाँ

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद छोटे - पढ़े या ना पढ़े कमेंट दे जाता है

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  2. बस चाँद लाइने और बात कितनी गहरी .....वाह......लाजवाब !!

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  3. सत्य तो अब फुटपाथ पे बिकता
    हरपल नेपथ्य में पड़ा दिखता है।

    Twitter.com/tweethindi

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  4. सत्य मुर्दे सा निस्तेज झूठ का ठहाका दे कर्ण भेद..
    ये काल का भी काल आया कि खुद को जला बुझी मशाल लाया..
    https://www.facebook.com/shantadvaitashram

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  5. सत्य हूँ मैं, असत्य से छोटा हूँ !
    खोट असत्य में है;
    लोग झूठे कहते हैं मैं खोटा हूँ !!!
    असत्य आसान सी राह पर
    चलता जाता है चलता जाता है
    बाग़ बगीचे झरना बेरी, सब आता है
    असत्य गहरी नदिया, खाई खंदक
    यहां तक कि सात समंदर भी
    आसानी से पार कर जाता है !
    क्योंकि उसे उछलना कूदना
    कुलांचे भरना सब आता है !
    मैं तो ठहरा सीधा साधा
    बच कर निकलना
    मुझे कब भाता है !
    मैं तो ठोकर खाता हूँ
    राह बनाता हूँ
    आगे बढ़ जाता हूँ !
    असत्य बड़ा चंचल है
    मुझे देख कर हँसता है
    चिढ़ाता है !
    मैंने सुना है असत्य
    गहरे जंगल में जाकर
    कंही खो जाता है !
    मेरा रास्ता दुखद
    लेकिन परिणाम सुखद होता है
    असत्य का रास्ता सुगम लेकिन
    परिणाम दुखद होता है
    इसीलिए वह फंसता है
    जब अन्धकार में
    तो बहुत रोता है !!!!!!!

    ajaygupta

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