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#कविता - मेरे प्यारे गांव










कहा अब 
वो गांव की मिट्टी,
यहाँ तो डामर की सड़के,
गिरने पर घुटने छिल देती है,

बरसो पहले 
जब धम्म से गिरा था 
दर्द तो हुआ था 
हड्डिया नहीं टूटी थी

यहाँ शहर में तो 
एक बार फिसल गया 
तो कई दिनों तक 
पट्टी बांधे फिरता था,

वो जो अँधेरी रातों में,
कोटर के कीड़े किरकिराते थे,
उन्हें अब यहाँ 
हॉर्न की आवाज ने 
दबा दिया है,

वो जो तलईय्या 
में छलांग लगाकर 
पोखरा में नहाते थे,
अब शॉवर के 
फव्वारों में बदल गए है,

वो जो जला कर चूल्हे में
लिट्टी और आलू का चोखा
बनाती थी अम्मा 
और 
साथ में नेउरा भाय की 
कहानी सुनती थी,
वो मजा नहीं है 
बर्गर, पिज़्ज़ा और 
शोर मचाती टीवी में,

हर बार सोचता हूँ
अब की आऊंगा,
लेकिन 
अब लगता नहीं कभी
आ पाउँगा,
राख जो मेरी आएगी
उसे सीने से लगा लेना,

मेरे प्यारे गांव
मैं तो तुझको 
हमेशा याद करता हूँ,
तू मुझको मत भूला देना,

टिप्पणियाँ

  1. हमेशा की तरह लाजवाब :D याद दिला दी बचपन की और गाँव की :)

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    1. दाल रोटी खाओ और गांव का नाम दोहराना

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  2. गाँव की सोंधी यादें हमेशा साथ रहती हैं ... भावपूर्ण रचना ...

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    1. अच्छा लगा की इन पंक्त्तियो से आपको गांव याद आ गया

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  3. बहुत सुन्दर .. अतीत के पन्ने पलट कर रख दिए हैं ... अच्छी प्रस्तुति

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    1. धन्यवाद, बहुत से लोग हैं जो बिछड़ गयें हैं

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  4. वाह...बहुत अच्छे ..काफी दिनों बाद आये आज बस्ती में ...काफी बदलाव देखने को मिल रहा है....

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  5. क्या बात है आपने बहुत सारी पुरानी बिसरी बातों का सुन्दर अहसास करा दिया

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    1. उम्मीद हैं उनमे मीठी यादें अधिक होंगी

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