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#व्यंग्य - आत्मसम्मान

क्या काम हैं? मंत्री साहब के इस सवाल के साथ मेरी नसों में एक सिहरन सी दौड़ गई। ऐसे लगा जैसे आसमान मुझपर गिर जाए या तो जमीन फट जाए और मैं इसी पल अपनी देह त्यागकर इस बेइज्जती से आजाद हो जाऊँ। आँखों में आँसूओ की ज्वाला भभक रही थी, यदि कुछ कतरें गिरजाते तो शायद आसपास एक जलजला उठ जाता।

मंत्री साहब ने घुड़कते हुए कहा,"बरामदे में जाकर बैठो अभी थोड़ी देर में तुमको बुलाता हूँ।"

पिछले महीने की बात थी मंत्री साहब मेरे घर स्वयं चलकर आए थे।   पुरानी बस्ती में जो नई इमारत बन रही थी उसके निर्माण के समय से कई मजदूर सुरक्षा की लापरवाही से मृत्यु की भेंट चढ़ गए थे। मैंने बिल्डर के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। मामला मीडिया में खूब छा गया। मंत्री जी चाहते थे मैं कुछ ले देकर बिल्डर से समझौता करलू परंतु मैंने अपने आत्मसम्मान के खिलाफ कुछ भी करना उचित नही समझा।

मेरी ही जनहित याचिका के चलते फुटपाथ पर सोते हुए लोगों को रौंदकर निकल जाने वाला अभिनेता कानून की गिरफ्त में आया था , शासन और सरकार का चलता तो उसे पहले ही दिन बेगुनाह साबित कर दिया जाता परंतु सरकार और शासन ने मेरे आत्मसम्मान का रौब था कि वो भी केस को फिर से स्वतंत्र तरीके से चलाने के लिए राजी हो गए थे।

कुछ महीने पहले एक लड़की मेरे पास मदद को आई थी। उसके चचेरे भाई - बहन उसे वैश्या वृत्ति के लिए मजबूर कर रहे थे। मैंने पुलिस में जाकर इस बात की ताकीद कि तो पुलिस वालों ने भी मामला ठंडे दिमाग से सुलझाने के लिए कहा क्योंकि शहर के एक मशहूर अखबार के मालिक का बेटा वो बार चलाता था जिसमें इस लड़की को वैश्या वृत्ति के लिए मजबूर किया जा रह था। मैंने अपने आत्मसम्मान के सामने किसी की एक भी ना सुनी और सभी को कानून के शिकंजे में कस दिया।

मेरी सारी नैतिकता आज इस भ्रष्टाचारी मंत्री की ढ्योढ़ी पर दम तोड़ रही थी। कल रात एक प्रेमी युगल को छेड़ छाड़ करने के बाद कुछ युवकों ने बहुत पीटा और उस पिटाई में अधमरा युवक हस्पताल पहुंचे उससे पहले ही दम तोड़ चुका था। उसके बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की, कुछ युवक गिरफ्तार हुए लेकिन एक लडके की तलाश जारी है। पुलिस का कहना है कि वो जिस लड़के की तलाश कर रहे हैं  उसका हुलिया मेरे बेटे जैसा है।  सीसीटीवी में साफ साफ तो नही दिखता परंतु रुपरेखा मेरे बेटे जैसी ही है और अब सिर्फ मंत्री जी मेरे बेटे को बचा सकते हैं क्योंकि शासन उनके हाथ में हैं।

यदि मेरे बेटे को जेल हो जाती है तो मेरा आत्मसम्मान दुनिया के सामने खोखला साबित होगा। इसलिए दरोगा साहब को तरक्की करवाने का लालच देकर खून की रिपोर्ट बदलवा दी है और अब उसके खून में शराब की मात्रा का कोई अंश नहीं है । डॅाक्टर साहब को अपने रसूख से एक सरकारी प्लॅाट दिलवाने का वादा कर दिया है। उन्होंने भी अपनी रिपोर्ट में मेरे बेटे के शरीर पर किसी भी तरह के हाथापाई के निशान ना मिलने की पुष्टि की है। अब सिर्फ नेता जी मान जाए तो मेरा आत्मसम्मान अडिग खड़ा रहेगा।

18 टिप्‍पणियां:

  1. vyanga likhne lage aap sahi se ab! aur is paid comment ke liye kuch milega kya :P :D

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    1. मिलेगा जरूर मिलेगा - आगे से हर लिंक दो बार भेजूंगा

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  2. बहुत ही बढ़िया व्यंग्य , इसी तरह लिखते रहो भाई :)

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  3. हा हा, ठीक ही लिखा है... लीजिए हमनें इसे बुलेटिन के आज के अंक मे ले लिया वह भी फ़्री....

    आज की ब्लॉग बुलेटिन अप्रवासी की नज़र से मोदी365 :- ब्लॉग बुलेटिन
    सादर आभार !

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  4. लाजवाब लिखते हो एक मूवी की स्क्रिप्ट लिखो हिट होगी 👌👍

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  5. एक कटु यथार्थ
    उम्दा व्यंग्य

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  6. सिर्फ मंत्री जी मेरे बेटे को बचा सकते हैं क्योंकि शासन उनके हाथ में हैं

    बहुत ही बढ़िया आउट सटीक व्यंग्य

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  7. बेहतरीन लेख

    ऐसे ही लिखते रहिये ।

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