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#ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे - 1 (ड्रामा)

१९८७

बॅाम्बे - तब मायानगरी को इसी नाम से बुलाया जाता था। उस समय भी बॅाम्बे तेज दौड़ता था लेकिन इतना नही जितना तेज आज दौड़ता है। हर किसी के पास समय था। लोग धीरे - धीरे अमिर बन रहे थे और रीयल स्टेट अभी भी आम लोगों के बस के बाहर था।

बॅाम्बे में भारत के कोने कोने से लोग आ रहे थे और ऊँची इमारतों के साथ - साथ झोपड़पट्टियों का जन्म भी जोरो शोरों मे था। दक्षिण बॅाम्बे में जगह नही थी इसलिए आबादी उत्तर मुंबई की तरफ बढ़ रही थी। अंधेरी से लेकर दहिसर तक झोपड़पट्टियाँ दावानल की तरह बढ़ रही थी। पहाड़ों पर बहुत जगह थी तो उन्हें काटकर लोगों के जमीन बना दी जा रही थी।

पहाड़ों को काटने और बेचने के धंधे मे शौकत सेठ ने बहुत पैसा कमाया लेकिन जो धन जैसे आवे वो धन वैसे जाए, शौकत खान को शराब और शबाब का नशा था और रोज रात बोरीवली के पायल बार में दिन भर की कमाई वहाँ की बार बाला किंजल के ऊपर उड़ जाती थी।

श्री कमलेश पंडित - इतना सम्मान इसलिए क्योंकि वो मेरे पिताजी है। उत्तरप्रदेश के जौनपुर से रहने वाले कमलेश अपने माता पिता की पाँचवीं संतान थे। कुल मिलाकर उनके १० भाई - बहन थे। उस समय ना तो सोशल मीडिया था और ना ही बड़े - बड़े छह इंच के मोबाइल लोगों के लिए बच्चा पैदा करना मनोरंजन का एकमात्र साधन था।

१९८६ के शुरुआत में पिताजी माँ के साथ बॅाम्बे आ गए। दहिसर में एक पहचान वाले के माध्यम से उन्होंने एक १२ फुट चौड़ी और १४ फुट लंबी एक झोपड़ी खरीदी। चारो तरफ से लोहे के पतरो से ढकी हुई और ऊपर भी वही लोहे की चादर। घर नही, स्टॅाव्ह के ऊपर रखा बरतन था ये मई की दोपहरी मे अंडे के जैसा उबाल दे।

पिताजी बीए पास थे और बीएड भी कर लिया था बॅाम्बे में उस समय उत्तर भारतीयों का आगमन बढ़ रहा था और धीरे - धीरे हिंदी माध्यम के विद्यालय भी खुल रहे थे। पिताजी को भी दहिसर में खुले एक नए विद्यालय में पढ़ाने को मिल गया। यदि आप ने उस विद्यालय को देखा होता तो मान जाते की देहातों को तबेला उससे बढ़िया होता है।

पिताजी की तनख्वाह सिर्फ नाम की थी। जो भी कमाना था वो ट्यूशन के माध्यम से कमाया जाता था और जैसे तैसे घर खर्च चलता था। हमारे अगल बगल में जौनपुर के कई लोग रहते थे इसलिए माँ चाहते हुए भी घर चलाने के लिए कुछ काम धंधा नही कर सकती थी। गरीब को भरपेट खाना ना मिले लेकिन उसे सम्मान जरूर चाहिए।

बॅाम्बे में  भी उस समय टीवी खरीदना आज की तरह बीस हजार रुपये के मोबाइल खरीदने जितना आसान ना था। बच्चे पैदा करना ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था और इसी तरह मई के महीने में मेरा जन्म हुआ। प्रायः मई के महीने में बॅाम्बे तपता रहता था लेकिन मेरे जन्म के दिन इंद्र देवता बॅाम्बे पर मेहरबान थे।

मेरे जन्म के दिन बॅाम्बे मे घनघोर बरसात हो रही थी। हमारे टीन के छप्पर में चारो तरफ से पानी टपक रहा था। मेरे घर से मुख्य सड़क का रास्ता आधा किलोमीटर से अधिक ना था लेकिन उस बरसात में कीचड़ के रास्तों से सड़क तक पहुंचना आसान ना था। उस समय सांप और गीदड़ सिर्फ रानीबाग मे नहीं पाये जाते थे अपितु दहिसर के उन जंगलों में इनका दर्शन आम था। प्रकृति की इन बाधाओं के बीच मेरा जन्म वहीँ झुग्गी में हुआ।

पिताजी ने मेरा नाम रखा कबीर।

- अगले गुरुवार को भाग २ के साथ मिलेंगे. इस कहानी में कुल १२ भाग है और हर गुरुवार को हम नए भाग के साथ मिलेंगे . आप इस कहानी पे अपनी टिपण्णी हमें जरूर लिखें.

टिप्पणियाँ

  1. मुंशी जी की झलक साफ़ दिखती है आपकी लेखनी में........शब्दों पर पकड़ और हर द्रश्य को इस तरह चित्रित करना आज के यूवाओं के लिए नामुमकिन है.....आपका हुनर वाकई भारत रत्न का हकदार है

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    1. धन्यवाद चेतन भाई, आपकी सरहना से काफी बल मिलेगा लिखने का

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  3. Bhai aap spiderman ho... shabdon ka Jo jaal aap buntey ho...kamaal hai ....aapki jitni tareef ki jaaye kam hai... shat shat naman hai _/\_

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    1. धन्यवाद, तारीफ से दिल ना भरे तो अकाउंट में पैसे डलवा देना :)

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  4. बहेतरीन पोस्ट
    अगले भाग का इंतज़ार रहेगा

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    1. धन्यवाद, हर गुरुवार को नया भाग लेकर हाजिर हो जायेंगे

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