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खुलजाये बचपन

अशोक और पिताजी रिश्ता हमारे मोहल्ले में रहने वाले सभी लोगो को पता था. उनके रिश्ते को देखकर लगता था कि दोनों बाप बेटे नहीं बल्कि दुश्मन हैं. अशोक के पिताजी तो हमेशा उसे पीटने के लिए बहाना तलाशते रहते थे. उनके हिसाब से वो जो भी कर रहे हैं वो उसके उज्व्वल भविष्य की लिए कर रहे हैं. लेकिन समय के साथ बाप और बेटे के बीच की दुरी बढ़ती गई. दोनों एक दूसरे से तभी बात करते थे जब कोई और मध्यस्था करने के लिए ना हो. 

अशोक के मन में उसके पिता का बरताव हमेशा से जिंदा था शयद इसलिए अशोक और उसके बेटे का रिश्ता बाप-बेटे का रिश्ता नहीं बल्कि दो दोस्तों का रिश्ता लगता था. अशोक अपने बेटे मंत्रा को मरना त दूर कभी जोर से फटकारता भी नहीं था, यदि मंत्रा से कोई गलती हो जाये तो वो उसे प्यार से उस गलती के बारे में समझाता था. मंत्रा भी अपनी समस्या या फिर अपने दिल की बात अशोक को बताने में बिलकुल नहीं हिचकिचाता था.

मंत्रा की पढाई उसके दोस्त अशोक हर किसी को उतने ही नजदीक से जनता था जितने नजदीक से एक दोस्त लोगो को समझ सके. अशोक हमेशा से कार खरीदना चाहता था लेकिन मंत्रा की पढाई-लिखाई के खर्च में उसके पास इतने पैसे ना बचते की वो कुछ खरीद सके. मंत्रा भी इस बात को जनता था इसलिए उसने अपनी नौकरी लगते ही कार के लिए पैसे जमा करना शुरू कर दिया. 

मंत्रा ने सबसे पहले पिताजी को एक स्मर्फोने खरीद कर दिया और कुछ महीने के बाद पिताजी क कार उनके सामने थी. अशोक का अपने पिताजी के साथ जो रिश्ता था उसका ठीक उल्टा रिश्ता उसका अपने बेटे का साथ था. बेटे और पिता का रिश्ता अशोक और मंत्रा की तरह होना चाहिए जिसमे सिर्फ और सिर्फ प्यार हो.

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