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#व्यंग्य - बाहुबली को कटप्पा ने क्यों मारा ?

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची. हलचल का कारण कोई राजनितिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था की हाल में सिनेमा हाल में लगी फिल्म बाहुबली में आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? फिल्म में कटप्पा के किरदार के पहले भाग से इस बात को मानना लाजमी था कि कटप्पा बाहुबली को नहीं मर सकता ता लेकिन फिल्म के अंत में कटप्पा ने बाहुबली को मारने के बात स्वयं कबूल कर ली जिससे सिनेमा देखने वालो में हलचल मच गयी और संसद में इस बात को लेकर आवाज तेज हो गयी.

सांसदों में कानाफूसी होने लगी कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा होगा. एक जनाब ने कहा,"बाहुबली केजरीवाल की पार्टी को सपोर्ट करने का विचार कर रहे थे और कटप्पा कट्टर भक्त हैं इसलिए उसने बाहुबली को मार दिया."

तब तक दूसरे जनाब ने कहा,"भाई फिल्म देखकर जितना मुझे समझ में आया उससे तो बाहुबली समझदार व्यक्ति लगता था इसलिए केजरीवाल की पार्टी को सपोर्ट करने का सवाल ही नहीं उठता है और जिस तरह से वो शिवजी की पिंडी अपने कंधे पर उठाकर दौड़ रहा था वो १००% हिंदू और भाजपा का समर्थक होगा."

अफवाहों का बाजार गरम था. मंत्री महोदय जब संसद में पहुंचे तो कई सांसदों ने सभा से वाकआउट करने की धमकी दे दी. मंत्री महोदय ने कहा,"अरे भाई भाग दो २०१६ में आएगा तो आप सब को पता चल जायेगा कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, तब तक देश के लिए कुछ काम कर लो." सभी सांसदों ने एक स्वर में कहा हम इस देश के नेता है बोलने का अंदाज बिलकुल मालिको जैसा था....हमें आम जनता से पहले पता चलना चाहिए कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ?

कई सदस्य एक साथ चिल्लाने लगे,"हमें जानना है कि बाहुबली को कटप्पा ने क्यों मारा?" आखिर हार मानकर मंत्री महोदय ने कहा कि तीन महीने के बाद एक स्वतंत्र कमिटी बनाकर "कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा इस बात का जांच करने के लिए कहा दिया.

एक सदस्य ने कहा - तीन महीने बहुत दूर है, हम तब तक इन्तेजार नहीं कर सकते हैं आपको अभी के अभी कमिटी बनाकर जांच शुरू करवा देना चाहिए. तब तक एक दूसरे सदस्य ने कहा, "क्यों ना अध्यक्ष महोदय बाहुबली के निर्माता या निर्देशक को फ़ोन करके उनसे जवाब तलब कर ले कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?"

मंत्री महोदय बोले - मै सदस्यों की बात से सहमत हूँ परंतु मेरे हाथ परंपरा और नीतियों से बंधे है. सरकार की एक कार्यप्रणाली होती है और मै सदस्यों के दबाव में आकर उस कार्यप्रणाली को नहीं छोड़ सकता लेकिन मै आप सभी को आश्वासन देता हूँ कि मेरी सरकार इसकी विस्तृत जाँच करवाके सदन के सामने रिपोर्ट पेश करेगी और मैं स्वयं इस मुद्दे पर संसद में वक्तव्य दूंगा.

शाम के वक्त अध्यक्ष महोदय ने संसद में अपना वक्तव्य देना शुरू किया. " माननीय संसद गण,"कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ये एक जटिल प्रश्न है. सरकार जल्दबाजी में इसपर कोई निर्णय नहीं लेना चाहती है. हमारी सरकार ने एक स्वतंत्र कमिटी का गठन किया है जो पिचले बीस सालो से कई महत्वपूर्ण घोटालो में जांच लकर रही है और अब वो इस प्रश्न के जाँच करके हमें रिपोर्ट सौपेंगे और फिर हम इसके आगे आपको इस सवाल पर जवाब देंगे.

एक सदस्य ने कहा," आपकी कमिटी पहले ही कई मुद्दों पर कई सालो से जांच कर रही है और आज तक कुछ साबित नहीं कर पाए. हमें आपकी कमिटी पर विश्वास नहीं है." इसपर मंत्री महोदय नाराज हुए और कहा कि मेरी कमिटी आपको अगली फिल्म के पहले पहले जाँच की रिपोर्ट सौंप देगी"

कुछ महीनों बाद - बाहुबली भाग २ के सिनेमा में आने के एक दिन पहले.

"माननीय संसद गण मुझे आप सब को ये बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रह है कि हमारे जांच कमिटी ने 'बाहुबली को कटप्पा ने क्यों मारा इस बात पर अपनी रिपोर्ट दे दी है. इस रिपोर्ट के अनुसार ये मामला बडा पेचीदा था और इस मुद्दे पर जन भावना भड़कने जैसी स्थिति आ सकती थी. इसलिए कमिटी ने ये निर्धारित किया है कि कल बाहुबली का भाग २ सिनेमा में आ रही है और आप सभी का सह परिवार टिकट संसद कोष से बुक किया गया है. आप सभी कल सिनेमा हाल में जाकर फिल्म का आनंद ले."

सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इस रिपोर्ट का हर्ष ध्वनि के साथ स्वागत किया और विपक्ष के सदस्यों ने टिकट हाथ में लेने के बाद कहा कि हम इस रिपोर्ट का खंडन करते हैं.

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4 टिप्‍पणियां:

  1. मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था,

    तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया।


    स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!!


    फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!!


    मैंने कहा
    - तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा.!!



    इसमें असहिष्णुता की क्या बात है.???


    वो कहने लगे खून चूसना उनकी आज़ादी है.!!



    "आज़ादी" शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.!!


    इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गई.,

    "कितने मच्छर मारोगे हर घर से मच्छर निकलेगा".???



    बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया.!!



    उनका कहना था कि मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे



    लेकिन खून चूस रहे थे , ये कहाँ सिद्ध हुआ है.??



    और अगर चूस भी रहे थे ,

    तो भी , ये गलत तो हो सकता है



    लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता,


    क्योंकि ये "बच्चे" बहुत ही प्रगतिशील रहे हैं.,


    किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है.!!

    मैंने कहा मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस.!!!


    तो कहने लगे ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है.!


    तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो.!!!


    मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.!!!



    इस पर उनका तर्क़ था कि भले ही यह गलत हो ,

    लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती,

    लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली.!!


    "फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया.!!!

    इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे.!!



    हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि , लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है,



    और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है.!!


    इस पर वो कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को ठीक ठहरा रहे हो..!!!


    मैंने कहा ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है.,


    मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.!!


    साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया.!!

    तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ., जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए..!!!


    इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया.!!!



    मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि "लेके रहेंगे आज़ादी".!!!

    मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था., उससे ज़्यादा जितना कि खून चूसे जाने पर हुआ था.!!!


    आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये: "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...."।


    और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा.!!!


    एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत.!!


    उसके बाद से न कोई बहस

    न कोई विवाद.,
    न कोई आज़ादी

    न कोई बर्बादी.,
    न कोई क्रांति
    न कोई सरोकार.!!!



    अब जब कुछ ठीक है.!!


    यही दुनिया की रीत है.!!!

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    1. आप ने तो टिप्पणी में पूरा एक व्यंग्य लिख दिया

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