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#ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे - 6 #ड्रामा

स्कूल चले हम

अब मेरी माँ के पास इतना पैसा तो नही था कि मुझे किसी अंग्रेजी स्कूल में दाखला दिलवा देती और बब्बी को भी तो स्कूल भेजना था। हम दोनो ही छह साल से अधिक उम्र के हो गए थे। माँ तो सोते ही रहती लेकिन पिताजी के एक दोस्त ने माँ से कहा कि यदि अंग्रेजी स्कूल में नही डाल सकती तो इन्हें अशोकवन के सरकारी स्कूल में डाल दो।

अशोकवन में एक सरकारी स्कूल था। मराठी माध्यम का स्कूल था लेकिन पिछले दो साल से उसमें हिंदी माध्यम भी चल रहा था। माँ मुझे और बब्बी को लेकर स्कूल में दाखले के लिए पहुंच गई। वहा के प्रधानाध्यापक ने जब माँ से हम दोनो का जन्म प्रमाण पत्र मांग तो माँ के पास कोई जवाब नही था। बब्बी का तो सारा दस्तावेज उसके घर मे जलकर खाख हो चुका था और मेरा कभी बना ही नही था।

हमारे यहाँ के नगरसेवक नामदेवजी बहुत ही मनचले इंसान थे, माँ को उनसे मेरे और बब्बी के जन्म के लिए एक पत्र लेना कोई कठिन काम नही था। अगले दिन पत्र लेकर हम स्कूल पहुंच गए और हमारा दाखला हो गया। स्कूल का समय था ९बजे से १बजे। एक ही स्कूल में तीन शिफ्ट में क्लास चलती थी तो हर क्लास को सिर्फ चार घंटे में ही निपटा दिया जाता था।

पहले एक दो दिन तो मैं और बब्बी स्कूल से भाग आए लेकिन फिर पता चला कि रोज दोपहर को स्कूल छूटने के समय मीठा दूध मिलता है। अब दूध पीने के लिए मैं और बब्बी रोज स्कूल छूटने तक घर नही आ सकते थे। दूध पीने के सिलसिले के साथ हमारी पढ़ाई भी शुरू हो गई।

एक साल के बाद खबर छपी कि एक दिन दूध पीने से एक स्कूल में कई बच्चों की मौत हो गई और उसके दूसरे दिन से दूध मिलना बंद हो गया। अब मैं और बब्बी किताब पढ़ लेते थे लेकिन लिखना ठीक से नही आता था। लिखना तो मुझे आज भी ठीक से नही आता। यहाँ मुंबई में हिंदी व्याकरण पर कोई विशेष ध्यान कहा देता है। किताब पढ़ना आ गया तो बस काम वही खतम।

एक दिन मास्टर साहब ने क्लास में घोषण कि कल से सभी बच्चों को ग्लूकोज की चार-चार बिस्किट मिलेगी। मिलनी तो ज्यादा चाहिए थी परंतु मास्टर साहब के घर के मेहमानों को भी तो कुछ खिलाना-पिलाना था। स्कूल बिस्किट सभी शिक्षकों के घर पर भी रोज बराबर की मात्रा में जाती थी।

बिस्किट का कार्यक्रम भी साल भर चला और उसके बाद बिस्किट की खरीदी करने में बहुत सी सरकारी धाधंलीया निकलकर सामने आई। महानगरपालिका ने तुरंत बिस्किट की खरीददारी पर रोक लगा दिया। अब हम स्कूल सिर्फ पढ़ने जाते थे। बब्बी और मैंने सरकारी स्कूल में कक्षा सातवीं तक पढ़ई पूरी कर ली।

मुंबई में महानगरपालिका के अधिकतर स्कूल सिर्फ सातवीं कक्षा तक है, इसके पीछे का तुक क्या है नही पता लेकिन हिंदी माध्यम के महानगरपालिका के स्कूल दसवीं तक कम ही है। शायद सरकार सभी को सिर्फ कक्षा सातवीं तक पढ़ाना चाहती थी। 

सातवीं के बाद की पढ़ाई करने मुझे और बब्बी को रोज बस पकड़कर मालाड जाकर करनी थी। माँ का मानना था कि बारह साल के बच्चो अकेले इतने दूर नही जा साकते और इसलिए हम दोनों ने सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। बब्बी घर का काम करती, मैं दिनभर खेलता रहता और माँ दूसरो के घर जाकर काम करके पैसे ले आती।


- अगले गुरुवार को भाग 3 के साथ मिलेंगे. इस कहानी में कुल १२ भाग है और हर गुरुवार को हम नए भाग के साथ मिलेंगे . आप इस कहानी पे अपनी टिपण्णी हमें जरूर लिखें.

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