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#ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे - 3 (ड्रामा)

बॅाम्बे में मिल मजदूरों की समस्या बढ़ती जा रही थी। भूमि पुत्र का नारा चारों तरफ बुलंद हो रहा था। मिल मजदूरों के संगठन राजनीतिक दलों के साथ मिलकर मिल मालिकों से अपनी भागीदारी माँग रहे थे। कुछ संगठनों की मांग जायज थी और कुछ की मांग पूर्णतः नाजायज थी। मिल मालिकों ने किसी जमाने में मुंबई की जमीनों को मिल बनाने के लिए औने-पौने दाम पर खरीद लिया था और अब वो मिल की खस्ताहाली देखकर उसपर बड़ी-बड़ी इमारते बनाकर बेचना चाहते थे।

मिल मजदूरों का आंदोलन जोर पकड़ रहा था। मिल मालिकों और मजदूर संगठनों को देखकर लगता था कोई भी मिल चलाना नही चाहता है। हर कोई अपना हिस्सा लेकर आगे बढ़ना चाहता है, दूसरी तरफ बॅाम्बे को मुंबई बनाने का प्रयास शुरू हो चुका था। एक क्षेत्रीय दल तेजी से उभर रहा था। उस दल का नाम था जन सेना पार्टी और उसका मुखिया एक कार्टून आर्टिस्ट था। बॅाम्बे की मिल मजदूरों को भूमि पुत्र का हिस्सा बोलकर जन सेना भी इस आंदोलन में कूद गई। देखते-देखते बॅाम्बे की कई मिले बंद हो गई और उनके मजदूरों को पैसा दे दिया गया। 

गनी अंसारी भी उन मिल मजदूरों में एक था। पैसा मिलने के बाद उसने अपना परेल का घर बेच दिया और हमारे मोहल्ले में आकर घर ले लिया। बॅाम्बे से मुंबई बनने की कवायद में झुग्गीयां बढ़ रही थी और साथ ही साथ नेताओं का वोट बैंक भी बढ़ रहा था। हमारे मोहल्ले में बिजली के तार आ गए थे और कुछ एक घरों के ऊपर एंटीना भी लग गया था। जिसे बारी बारी से उनके घर वाले घूमाते रहते थे। हम भी लोगो के घरों पर जाकर रामायण देखने लगें। रामायण के दिन टीवी वाले घर में बहुत भीड़ होती थी। दरवाज से लेकर खिड़की तक मुंबई लोकल की तरह लोगों से भरे होते थे।

प्रायः मुसलमान लोग मुसलिम बस्ती में घर लेते हैं परंतु गनी भाई ने हिंदुओं के मोहल्ले में घर लिया था। उनके परिवार में दो लड़की शायरा औरर बब्बी थी और उसका एक लड़का फिरोज था। हम सब लगभग हम उम्र थे। हम चारों में उम्र का फासला कोई दो से तीन साल का रहा होगा। हम सब रोज साथ में खेलते थे। वही दूसरी तरफ जन सेना ने नया अभियान छेड़ दिया था,"उठाओ लुंगी और बजाओ पुंगी" । मुंबई में दक्षिण भारतीयों की पैठ बढ़ रही थी। हर खुलने वाले बार का मालिक कोई अण्णा ही होता था लोगो में डर बनाकर हप्ता वसूलना इस अभियान का एक मात्र उद्देश्य था।

मुंबई में उत्तर भारतीयों की संख्या भी बढ़ रही थी। रिक्शा चलाना, भाजी बेचना, दूध बेचना और कई ऐसे ही छोटे मोटे काम उत्तर भारतीयों के भरोसे चल रहे थे। हर तीसरा उत्तर भारतीय जौनपुर जिले से था। अमूमन उत्तर प्रदेश तो पिछड़ा था ही परंतु जौनपुरीयों की संख्या देखकर लग रहा था कि जौनपुर वहाँ का अतिपिछड़ा जिला था। उत्तर भारतीयों की बढ़ती संख्या भी एक वोट बैंक थी परंतु जन सेना भूमि पुत्र के मुद्दे पर कमजोर नही दिखना चाहती थी और दूसरा उत्तर भारतीय जो काम कर रहे थे उसमें पैसा भी ज्यादा ना था और कोई भी भूमि पुत्र वो काम करने को तैयार नहीं था। इसलिए उन्होंने इस वोट बैंक पर अधिक ध्यान नही दिया। दूसरी तरफ बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने उत्तर भारतीयों में से नेता चुनकर खड़ा कर दिया।

बॅाम्बे पूरी तेजी से मुंबई बनने के लिए दौड़ रहा था। लोकल ट्रेन के डिब्बे बढ़ गए थे। सड़क पर गाड़ियों की भीड़ बढ़ गई थी। हर तरफ बड़ी बड़ी बिल्डिंगो का काम शुरू हो गया था। खाड़ीयो को पाटकर जमीन बनाई जा रही थी। बेस्ट की बसे अब मुख्य सड़क छोड़कर गलियों में आने लगी थी। नगर पालिका को महानगरपालिका घोषित कर दिया गया था। हर तरफ बदलाव का महौल था। अंग्रेजी माध्यम और हिन्दी माध्यम के स्कूलों की संख्या बढ़ रही थी। ऊपर खंभे पर लटकते तार अब जमीन के अंदर जा चुके थे।

बॅाम्बे अब मुंबई बन चुका था।


- अगले गुरुवार को भाग 4 के साथ मिलेंगे. इस कहानी में कुल १२ भाग है और हर गुरुवार को हम नए भाग के साथ मिलेंगे . आप इस कहानी पे अपनी टिपण्णी हमें जरूर लिखें.

#ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे - 1 (ड्रामा)


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