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#व्यंग्य - नेता जी की कड़ी निंदा - ब्रहमास्त्र


निंदा करना हर व्यक्ति का जन्म जात हक है। कही कुछ भी गलत हो तो  निंदा कर दो। कुछ लोग तो गलत नही होने पर भी निंदा कर देते हैं। हमारे वर्तमान राजनीति के नेता विपक्ष में रहकर उन सरकारी योजनाओं की भी निंदा कर देते हैं जिसका पक्ष में रहकर उनके सरकार ने खाका तैयार किया था।

१९४७ के पहले गाँधी जी ने भी अंग्रेजों की बहुत निंदा की। गाँधी जी ने तो चौरीचौरा कांड के बाद उस कांड में शामिल भारतीयों की भी निंदा कर दी थी। मुझे हमेशा से लगता रहा कि गाँधी जी को भी निंदा करना भाता रहा होगा परंतु फिर याद आया वो निंदा के साथ अनशन भी करतें थे। उससे मानवधिकार के हितैषी बरतानिया की जनता अंग्रेजी सरकार पर दबाव डालती थी और निंदा/अनशन अपना कार्य करते थे।


१९४७ के बाद भारत आजाद हुआ और कुछ दिनों के भीतर ही गाँधी जी को गोडसे ने जान से मार दिया। गाँधी जी की हत्या की सभी ने निंदा की परंतु साथ ही साथ सरदार पटेल ने गोडसे को पकड़कर जेल में डाल दिया और न्यायपालिका ने कुछ दिनों में उसे फांसी की सजा देकर निंदा को अंतिम अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

उस घटना के बाद से निंदा पूर्णतः अहिंसक हो गई। नेता लोग निंदा तो करने लगे लेकिन उसके परिणाम?

भारत में आये दिन आतंकवादी हमले होने के बाद निंदा का प्रचलन आम हो गया। मुंबई में एक बम धमाके के बाद एक नेता ने बम धमाके की निंदा की, मुझे लगा अब इस निंदा से बम धमाके नही होंगे लेकिन कुछ महीनों बाद उग्रवादियों ने कई सीमा सुरक्षा बल के जवानों को जान से मार दिया। नेता जी इस घटना के बाद निंदा से एक कदम आगे बढ़े और इस हमले की कड़ी निंदा कर दी। 

नेताजी के कड़ी निंदा से मुझे लगा अब तो चैन और अमन लंबे समय तक कायम रहेगा परंतु उसके कुछ दिन बाद मुंबई में २६\११ का हमला हुआ। पूरी मुंबई आतंक के नाच से भयभीत हो गई। नेताजी विपक्ष के थे तो इस बार उन्होंने बहुत कड़ी निंदा के साथ साथ गृह राज्य मंत्री का इस्तीफा भी मांग लिया। बेचारे गृहमंत्री भी इस घटना की निंदा कर चुके थे परंतु अपने ब बोलेपन के कारण त्यागपत्र देने पर मजबूर हो गए  मुझे लगा इस बार तो आतंकवादी डरकर अपने बिल से कभी बाहर नही आयेंगे लेकिन आगे  की घटनाओं का संज्ञान तो आप समाचार पत्रों में लेते रहतें हैं।


नेताजी मंदिर की भगदड़, ट्रेन दुर्घटना, भुखमरी से लोगों की मृत्यु और बम धमाकों की निंदा करतें रहते हैं। अब भगवान से प्रार्थना करना चाहता हूँ कि कम से कम नेता जी की निंदा को अन्नपूर्णा बना दे जिससे गरीबों का पेट भरे या फिर उसे ब्रहमास्त्र  बना दे जिससे उनके निंदा करते ही आतंकवादियों की मृत्यु हो जाए।

इस लेख पर अपनी निंदा करना मत भूलना और अगले सोमवार एक नए व्यंग्य के हाथ मिलेंगे। ड्रामा/लघु उपन्यास  पढ़ना चाहते हैं तो गुरुवार को भी  #ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे  पढ़ने आ सकते हैं

1 टिप्पणी:

  1. भाई व्यंग्य और कटाक्ष करना तो कोई आपसे सीखे, कितनी खूबसूरती से पिरोया है शब्दों को , महज़ अपनी कलम के ज़रिये लोगो की सोई हुई आस और खोये हुए विश्वास को जगाने का जो हुनर आप में है वो आज तक कहीं नहीं देखा।
    आपके इस जज्बे को मेरा सलाम दोस्त :D :D

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