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#ब्वॅाय_फ्रॅाम_बॅाम्बे - 8 #ड्रामा

होली 

कब है होली? गब्बर का शोले फिल्म का ये डायलोग होली का जिक्र होने पर जरुर याद आता है। समय के साथ-साथ सभी त्यौहारों की रुप रेखा बदल रही थी। होली भी समय के साथ बदल रही थी। राह चलती लड़कियो पर दूध की थैली में पानी भरकर मारना, रंगों की जगह ओइल पेंट ने ले ली थी। थैली की चोट से कुछ लड़किया गाली गलौज करती तो कुछ लड़किया अपने को बचाते हुए निकल जाती।

कबीर भी होली में वो सब करता जो उसे नही करना चाहिए था। शराब पीना, भांग खाना, गांजा फूकना, और लड़ाई-झगड़ा करना। हर काम में कबीर अपने आप को आगे रखता था। रात को वो चुपचाप बब्बी के कमरे में जाकर सो जाता और बब्बी भी उसे माँ से बचाने के लिए चुपाचाप खाना पहुँचाकर सो जाती थी। अब बब्बी और कबीर की शादी तय हो गई थी इसलिए चंदाकुमारी भी सब कुछ जानते हुए कुछ नही बोलती थी।

बब्बी को होली में पानी की थैलियों का सामन नही करना पड़ता था क्योंकि सभी में कबीर का डर था। होली के एक दिन पहले शाम के वक्त शलुन बंद करते वक्त एक लड़की ने बब्बी से कहा कि आप मुझे नाके (चौराहा) तक छोड़ दो, नही तो मव्वली बच्चे थैली मारकर उसकी मेहंदी खराब कर देंगे। बब्बी के लिये नाके तक जाना कोई बड़ी बात नही थी। बब्बी उस लड़की को लेकर नाके पर छोड़ने गई।

बब्बी घर के लिए वापस बढ़ी ही थी कि किसी लड़के ने आकर उसके चेहरे पर रंग लगा दिया। आज तक बब्बी को कबीर के अलावा किसी ने नही छुआ था। बब्बी ने उस लड़के को एक जोर का चाटा लगाया और वापस घर की तरफ मुड़ गई। उस लड़के ने पीछे से बब्बी का दुपट्टा खीचा और लेकर भागने लगा। वो कुछ ही कदम दौड़ा था कि उसके चेहरे पर एक जोर का घूसा पड़ा। कबीर वहाँ पहुँच चुका था और उस लड़के को मार मारकर बेदम कर दिया।

कबीर उस लड़के को मार ही रहा था कि पुलिस वहाँ आ गई। मुंबई पुलिस हमेशा जो मार खा रहा है उसके तरफ हो जाती है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नही है कि गलती किसकी थी। पुलिस ने कबीर को गिरफ्तार कर लिया। बब्बी रोते रोते माँ के पास पहुँची और सारी कहानी शुरू से लेकर अंत तक बयान कर दिया। आस-पास वालों का कहना था कि यदि कबीर आज नही छूटा और उसके खिलाफ केस दाखिल हो गया तो कई साल तक कोर्ट के चक्कर लगाने होंगे।

कबीर को छुड़ाने के लिए चंदा देवी को नामदेव के पास जाना पड़ा। नामदेव अब विधायक बन गया था। दहिसर और उसके आस पास के इलाके में कई नाजायज शराबखाने और डांसबार चलाता था। चंदा देवी को नामदेव तब से जानता था जब वो नगरसेवक था। चंदा देवी के पति की मृत्यु के बाद नामदेव उन्हें अपने दल में महिला मोर्चा का प्रमुख बनाना चाहता था लेकिन चंदा देवी ने उसका प्रस्ताव कभी नही स्वीकार किया।

रात होने तक कबीर जेल से छुटकर घर आ गया था और दूसरे दिन सुबह चंदा देवी की लाश उनके घर के पंखे पर लटक रही थी। चंदा देवी ने शायद कबीर को बचाने के लिए अपने सती व्रत का त्याग कर दिया था और उसकी सजा स्वयं को आत्महत्या करके दी।


- अगले गुरुवार को भाग 8 के साथ मिलेंगे. इस कहानी में कुल १२ भाग है और हर गुरुवार को हम नए भाग के साथ मिलेंगे . आप इस कहानी पे हमें अपनी टिपण्णी जरूर लिखें.

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