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कुछ पल #SpreadTheVibe

बैंड स्टैंड के किनारे एक पत्थर पर बैठकर , एक नज्म को रंग रूप देने की जद्दोजहद में लगा था। वैसे तो मुंबई में ठंड नही पड़ती लेकिन आजकल तापमान २०° चल रहा था। हम जैसे बॅाम्बे में पले बढ़े और मुंबई में रहनेवालों के लिए इस तापमान को ही ठंड का विकराल रूप मान लिया जाता है।

बैंड स्टैंड के तट से पानी पीछे की तरफ लौट रहा था और प्रेमी युगल अपने प्यार का दायरा बढ़ाते जा रहें थे। जितना अंदर की तरफ छिपकर बैठेंगे उतना ही प्यार जताने में आसानी होगी। इसी चक्कर में कई बार तो कुछ प्रेमी युगल समंदर की भेंट चढ़ गए। कुछ तो अंदर की तरफ इसलिए बैठते हैं कि किन्नर वहाँ आकर उन्हें परेशान नहीं करें।

बैंड स्टैंड से बांद्रा स्टेशन जाने के लिए रिक्शा पर ४०₹ खर्च करने की जगह मैंने बेस्ट की बस से १०₹ में ये सफर तय करने का निश्चय लिया। वैसे भी जेब में सिर्फ ५०₹ थे। इतने पैसे में घर भी पहुँचना था और रात का खाना भी खाना था। अचानक से दिल किया कि क्यों ना २ किलोमीटर का रास्ता पैदल चलके तय किया जाए, वॅाक भी हो जाएगी और पैसे भी बच जायेंगे। अकसर जब मेरे पास पैसे नही होते हैं तो मैं इस तरह के विचारों से स्वयं की गरीबी को अमीरी में बदलकर रखता हूँ।

चलना शुरू ही किया था कि शाहरुख खान के घर मन्नत के सामने विपरीत दिशा में एक औरत और आदमी झगड़ा कर रहे थे। मामला शराब पीने का था, पत्नी पैसे कमाकर लाती और पति उस पैसे की शराब पीकर पत्नी को ही पीटा करता था। मैंने एकबार उनके बीच जाकर इस झगड़े को छुड़ाने की चेष्टा की परंतु वहाँ खड़े लोगों ने मुझे मना कर दिया। "साहब इनका रोज का है,आप क्यों इनके लफड़े में पड़ता है।"

मैंने कदम आगे बढ़ाना शुरू किया। सलमान खान साहब का घर आते आते कुछ भिखारी आपस में मिल बांटकर केक खाते दिखाई दिए। क्रिसमस के दिन चल रहें हैं तो किसी भले व्यक्ति ने अपने सैंटाक्लॅाज होने का धर्म बखूबी निभाया था। वहीँ आगे चर्च की तरफ सड़क पर रहने वाला एक परिवार २०° तापमान में (जो रात होने के साथ घटता जा रहा) ठंड से बचने के लिए सड़क के किनारे से कागज,थैली,लकड़ी लाकर अलाव जलाकर स्वयं को गर्म रखने के जुगाड़ में लगा था।

चलते चलते मैं बांद्रा मार्केट में पहुंच गया। सभी दुकानदार अपनी दुकान बंद कर रहें थे। कल आने के लिए आज का जाना जरूरी है। सभी अकुताये से लग रहें थे कि कब दुकान का सारा माल बांधकर सुरक्षित करें और घर की तरफ निकलें। घर,परिवार और दुकान के अलावा शायद ही उन्हें कोई तीसरी वस्तु से मतलब हो।

बांद्रा स्टेशन पर पहुंचा तो लोकल के आने में अभी दस मिनट बाकी थे। नजर को इधर उधर दौड़ाने पर एक चाय का स्टॅाल दिखा। मैं चर्चगेट की तरफ था और चाय का स्टॅाल बोरीवली की तरफ था। लोकल आने में समय काफी था और ठंड से बचने के लिए एक प्याली चाय ६₹ की अधिक महंगी ना थी। लोकल आनेपर उसमें बड़ी भीड़ दिखी। पूछने पर पता चला ये बोरीवली की अंतिम लोकल है तो इसमें थोड़ी भीड़ रहती है। लोकल में भी सभी अपने अपने काम में व्यस्त थे। टेम्पल रन खेलने से लेकर खड़े खड़े सोने तक की कवायद जारी थी।

"इतनी देर हो गई,कहा रह जाता है रोज? कल से अगर देर की तो दरवाजा नही खोलूंगी।" अम्मा होती तो शायद यही कहती। चायनीज वाले के यहाँ से हाल्फ राईस ले लिया था। वैसे दिल तो नूडल्स खाने का था पर उसके पास राईस के अलावा कुछ नही बचा था। परंतु आज बैंड स्टैंड से बांद्रा आने तक के रास्ते में इतना कुछ सीखा था की राइस भी छप्पन भोग की तरह लग रहा था। हमें जीवन में जो कुछ मिला है उसी में खुश रहकर समाज कल्याण के लिए कार्य करते रहन चाहिए क्योंकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हे रहने के लिए छत और बिछाने के  भी नही मिलती है। 

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