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#व्यंग्य - कोर्ट

नारायण पासी जितने दिन बाहर खुली हवा में सांस लेते थे उतने ही दिन जेल के अंदर रहते थे। उत्तर प्रदेश के एक पासी परिवार में जन्मे नारायण पासी के पूरे गांव को बचपन में दूसरी जात वालों ने आग के हवाले कर दिया था। नारायण पासी उस समय अपनी नानी की गोदी में कहानियाँ सुन रहें थे अर्थात अपने ननिहाल में थे इसलिए बच गए। उनके पिताजी आजदी की लड़ाई में क्रांतिकारी दाल के सदस्य थे और भारत के आजाद होने के कुछ दिन पहले ही उन्हें अंग्रेजी सरकार ने जेल से छोड़ा था। अपने बेटे नारायण को उन्होंने बचपन से अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाया था और इसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के रास्ते में अपनी जान दे दी। 

बचपन में अपने परिवार को खो देने के बाद नारायण ने अपनी नानी के यहाँ से पढाई लिखाई को जारी रखा और साथ में ही उन्होंने वीर रस गाना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर वीर रस गाकर गरीबों और पिछड़ों को ललकारना उन्हें उत्साहित करना जिससे वो अन्याय के खिलाफ लड़ सके उनका अब मुख्य कार्य था। अन्याय करनेवालों को उनका वीर रस का गाना पसंद नहीं था क्योंकि नारायण पासी के गाने उनके खिलाफ होते थे। पैसेवालों से बार बार लोहा लेने के कारण उनका जेल जाने का कार्यक्रम लगातार चलता ही रहता था और भारत में लगे आपतकाल के समय उनपर कई तरह की धाराएं लगा दी गई लेकिन सरकार उन्हें पकड़ ना सकी।

एक दिन एक कार्यक्रम में वीर रस का गान करते समय उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मामला आत्महत्या का था। एक गटर साफ करनेवाले व्यक्ति की गटर साफ करते समय मृत्यु हो गई थी। पुलिस ने इस बात का जिम्मेदार नारायण पासी को ठहराया था। पुलिस के अनुसार एक वीर रस में नारायण पासी ने कहा था की गटर साफ करने वालों को कार्य के दरम्यान जो समस्या उत्पन्न होती है उसे सरकार के कानो तक डालने के लिए उन सभी को मिलकर आत्महत्या करनी चाहिए। जिससे राज्य और दिल्ली में बैठी सरकार अपने नींद से जागेगी।

पुलिस ने नारायण पासी पर जिन क़ानूनी अधिनियमों के तहत मामले दर्ज किये थे। वैसे मामले भारत के इतिहास में हुए दंगों के आरोपी पर भी नहीं दर्ज हुए होंगे। लोगो को जान से मारकर आप बच सकते हैं लेकिन गाना गाकर बचना नामुनकिन था इस तरह हर मोड़ पर कई बार अंग्रजों के ज़माने में बने कानून भारतीय समाज की हंसी उड़ाते रहते हैं। नारायण पासी के ऊपर जब न्यायालय की कार्यवाही हुई तो जज ने उन्हें जमानत देने से मना कर दिया। अभियोग पक्ष के वकील का मानना था कि वो आपातकाल के समय पुलिस से भागते फिर रहें थे इसलिए उन्हें जमानत नहीं मिल सकती है, अब उन जनाब को कौन समझाए की आपतकाल में आधा भारत पुलिस से बचता फिर रहा था।

इस मामले को लेकर अदलात में जो तथ्य सामने आये वो कुछ इस तरह थे - मृत गटर साफ करनेवाला उस होल से गटर में उतरता था जिसको खोलने से अंदर से तिलचट्टा बाहर आता हो, इससे उसे ज्ञात होता था की गटर के अंदर सांस लेनेभर की हवा है। गटर में बदबू से बचने के लिए मृत कर्मचारी गटर में उतरने से पहले देशी शराब पीता था जिससे नशे में उसे बदबू की समझ ना रहे और वो आसानी से अपने फावड़े से गटर साफ कर सके। मृत कर्मचारी के पास गंबूट भी नही था। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के अनुसार उसकी मृत्यु जहरीली हवाओं के उसके फेफड़े में घुसने से हुई थी। जिस गवाह ने नारायण पासी के खिलाफ गाना गाने की गवाही दी थी वो ऐसे ही कई और मामलों में पुलिस का गवाह बना हुआ था, जिससे न्यायलय ने उसकी गवाही को नहीं माना। इस तर पूरे सात साल जेल में रहने के बाद नारायण पासी को न्यायालय ने बेगुनाह पाकर सभी अपराधों से मुक्त कर दिया।

बस अब यही कहना है​,​​"​न्यायालय के यहाँ सात साल की देर है ​लेकिन ​अंधेर नही!​"​

यह व्यंग्य मराठी फिल्म "कोर्ट" पर आधारित है। आपसे निवेदन करुंगा की एक बार इस फिल्म को जरूर देखें।

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