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#कविता - बेल का गुमान

वो जो बेल जमीन पर पड़ी रहती थी, 
अब छत के ऊपर से जमीन की घासों को चिढ़ाती है,
बुलाती हैं घासें उसे खेलने को,
पुराने दिनों के किस्से सुनाने को,
लेकिन बेल का तरीका वो नही रहा,
वो तो अब ऊपर है,
उसका गुमान उससे भी ऊपर,
कहती है नीचे आकर मैं गंदी हो जाऊंगी,
फिर छत पर मिट्टी के धब्बे लगेंगे,
छत का मालिक मुझे काटकर फैक देगा,
एक छोटी सी घास ने कहा,
अरे गैरत है कि नही तुझमें,
पहले भी जब तू जमीन पर रेंगती थी,
हमने कभी मिट्ट नही लगने दी तुझे,
तेरे पत्तो के फाए चुभते हमें,
लेकिन तेरी दोस्ती में हमने आह तक ना ली,
बेल अब भी अपने जगह से ना हिली,
कुछ दिन बीत गए,
दिवाली में छत की सफाई में,
उस बेल को जड़ से काट दिया,
उस बेल का गुमान अब
सूख सूखकर उड़ता हैं हवाओ में I

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