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#व्यंग्य - चरित्रहीन अभया

अभया का पति कई साल पहले भारत छोड़कर बर्मा आ गया। कुछ दिनों तक उसने अभया को पत्र लिखे और पैसे भी भेजें लेकिन फिर सिलसिला जो थमा तो फिर कभी नहीं आरंभ हुआ। जिस स्त्री का मोह उसका पति नहीं करता है, समाज में उस स्त्री का मोह करनेवाले बहुत से सज्जन पैदा हो जाते हैं। अभया के पति की अनुपस्थिति और पत्र ना आने की खबर गाँव में दावानल की तरह फैल चुकी थी और हर कोई उससे दिल्लगी करना चाहता था। अभया भी समाज की बारीकियों को अच्छी तरह समझती थी और इसलिए उसने अपने मुँह बोले भाई रोहिणी के साथ बर्मा आकर अपने पति को खोज निकालने का निर्णय लिया था। भारत से बर्मा की यात्रा के दौरान मेरी उससे मुलाकात और पहचान हुई।
बर्मा की कई महीने तक खाक छानने के बाद मुझे जब एक लकड़ी काटने वाली कंपनी में नौकरी मिल गई तो वहाँ मेरे पास एक मुलाजिम का मामला आया, जिसके ऊपर चोरी का अपराध लगा था। उस मामले के जाँच में जब मैं उस मुलाजिम से मिला और उसकी फाइल देखी तो तुरंत समझ गया की यह अभया का पति है। उससे बात करने पर पता चला कि उसने यहाँ पर एक बर्मी लड़की से विवाह कर लिया है और उसके बच्चे भी हैं। जब मैंने उससे अभया को इस तरह बीच मझदार में छोड़ने का कारण पूछा तो उसने सारा दोष अभया के चरित्र पर मढ़ दिया। उसकी बातें सुनकर मेरा क्रोध उस चरम सीमा पर था जहाँ यदि मेरे पास तीसरा नेत्र होता तो अभया का पति जलकर खाक हो जाता।
मैंने अभया के पति से सीधे - सीधे शब्दों में कहा दिया कि उसे यदि इस मामले से रिहा होना है तो उसे अभया की तरफ से एक क्षमा पत्र लाना होगा। अभया का पति दूसरे दिन क्षमा पत्र लेकर हाजिर था। स्त्री जीवन उसके संघर्ष के बारे में और कुछ बताने को नहीं रह गया। जिस पुरुष ने उसे इस तरह समाज में बेआबरू होने के लिए छोड़ दिया था उसे क्षमा करने के लिए उसे एक क्षण का भी समय नहीं लगा। अभया के पत्र को पढ़ने के बाद मैंने उसके पति को एक कागज पर बहाली का निर्देश दस्तख़त करके दे दिया। आदेश हाथ में मिलते ही उसके पति ने मुझसे कहा कि वो अभया को अब अपने साथ लेकर रहेगा।
कुछ दिनों बाद।
अब मुझे अभया के पति का एक पत्र मिला। पहले के ही समान कृतज्ञता सारी चिट्ठी में बिखेर देकर इस बात का बड़े ही अदब और विस्तार के साथ निवेदन करके कि इस समय वह कैसे संकट में पड़ा है, उसने मुझसे उपदेश चाहा है। बात संक्षेप में यह थी कि उसने अपनी शक्ति से अधिक खर्च करके भी एक बड़ा मकान किराये पर ले लिया है; और उसमें एक ओर अपने बर्मी स्त्री-पुत्रादि को रखकर दूसरी ओर अभया को लाकर रखने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु किसी तरह भी उसे सम्मत नहीं कर पाता है। सहधर्मिणी की इस तरह की हठ से वह अतिशय मर्म-पीड़ा अनुभव कर रहा है।
यह केवल 'कलि-काल' का फल है, 'सतजुग' में ऐसा नहीं हो सकता था- बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तक भी। अनेक दृष्टान्तों समेत उनका बार-बार उल्लेख करके उसने लिखा है कि हाय! कहाँ है वे आर्यललनाएँ? वे सीता-सावित्री कहाँ गईं? जो आर्य-नारियाँ पति की चरण-युगलों को हृदय में धारण करके हँसती-हँसती चिता में प्राण विसर्जन कर देती थीं और पति सहित अक्षय स्वर्ग-लाभ करती थीं वे अब कहाँ है? जो हिन्दू महिला हँसते हुए चेहरे से अपने कुष्ठग्रसित पति-देवता को कन्धों पर लादकर वेश्या के घर तक पहुँचा आई थीं, कहाँ है उस जैसी पतिव्रता रमणी? कहाँ है वह पति-भक्ति? हाय भारतवर्ष! क्या एकदम ही तेरा अध:पतन हो गया।
वह सब क्या अब हम लोग एक दफे भी अपनी ऑंखों न देखेंगे। और क्या हम लोग-इत्यादि इत्यादि, करीब दो पन्ने विलाप से भर दिए हैं। किन्तु अभया पति-देवता को यहाँ तक ही मानसिक कष्ट देकर शान्त नहीं हुई। और भी सुनिए। उसने लिखा है कि इतना ही नहीं कि उसकी अध्र्दांगिनी अब भी दूसरे के घर में रह रही है, बल्कि उसे आज अपने परम मित्र पोस्ट मास्टर से मालूम हुआ कि रोहिणी नामक किसी व्यक्ति ने उसकी स्त्री को पत्र लिखा है और कुछ पैसे भेजे हैं। इससे इस हतभागे की इज्जत को कितना धक्का लगा है सो लिखकर बताया नहीं जा सकता।
पत्र पढ़ने के बाद एक बार फिर तीसरी आँख से अभया के पति को जला देने के लिए मेरा मन व्याकुल हो गया। उसके पति ने शायद लज्जा नाम का शब्द कभी नहीं सुना था। जो स्त्री समाज बड़े आराम से अपने देश में लोगों से दिल्लगी करके अपना जीवन बड़े आराम से बिता सकती थी, उसने इस पापी के लिए अपने जान की परवाह किये बिना इतनी भयानक समुद्र यात्रा को तय किया और वो अभी भी उसे चरित्रहीन और स्वयं को मर्यादा पुरषोत्तम बता रहा है।

- शरतचंद्र के उपन्यास "श्रीकांत" की एक घटना पर आधारित

टिप्पणियाँ

  1. कभी पता चले कि ये ब्लाग किसका है तो कृपया हमें भी बताइयेगा। टिप्पणी इसमें देने के बाद छपती हैं कहीं तो दिखाइयेगा।

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  2. व्यंग लगी
    मार्मिक
    स्त्री का इसी तरह
    शोषण किया जाता रहा है
    तब भी और
    अब भी
    सादर

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