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#व्यंग्य - काहें के मर्यादा पुरुषोत्तम?

गौतम बुद्ध ने मूर्ति पूजा के खिलाफ बौद्ध धर्म को स्थापित किया परंतु उनके समाधी लेने के बाद उनके भक्तों ने उन्ही की मूर्ति बनाकर पूजा करना आरंभ कर दिया। बुद्ध तो अपने समय में बेलमुंड होकर घूमते थे परंतु उनकी मूर्तियों में उन्हें जुड़ा-जटाधारी दिखाकर सुंदर बनाया गया। यदि मैं इस सत्य को एक प्लेकार्ड पर लिखकर यहाँ - वहाँ जाना आरंभ कर दू तो मुझे शा तक अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है।

एक बार जब समाज में भक्त अपने पूज्य के प्रति आस्था कायम कर लेतें हैं तो वहाँ सत्य का दर्शन करवाना कठिन हो जाता है। हमारे भारत देश में जहाँ लोग अपने पूज्य नेता के निधन के बाद आत्महत्या को हँसते - हँसते गले लगा लेतें हैं वहाँ सत्य को तथ्यों के बाद भी भक्तों के सामने सत्यापित करना नामुमकिन कार्य है। जिस किसी महापुरुष ने इस कार्य को करने का प्रयत्न किया उन्हें कोई भी नहीं जान सका।

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार एक युग में एक महान पुरुष ने नर रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया। भगवान का अवतार होते हुए भी उन्होंने अपने जीवन काल में किसी भी चमत्कारिक कार्य को ना तो स्वयं किया और ना ही अपनी धर्मपत्नी को करने दिया। अपने पिताजी के वचन की लाज रखने के लिए श्री रूप ने सत्ता को त्याग वन को अपना घर बना लिया।

श्री रूप की पत्नी जब कई वर्षों के वियोग के बाद उनके पास वापस लौट कर आई तो उस देवी स्वरुप स्त्री को अग्निपरीक्षा देकर अपने पवित्रता का प्रमाण देना पड़ा। नगर लौटने के बाद जब एक सुंदर परिवेश का निर्माण हो रहा था, तब उस देवी को एक धोबी की नजर लग गई। श्री रूप ने धोबी द्वारा अपनी पत्नी को उल्हाना देने पर स्वयं की पत्नी की तरफ उठते चरित्र के सवाल पर पत्नी का त्याग कर दिया।

समाज श्री रूप को आज मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जानता है परंतु मेरा सवाल यही है कि जिस पत्नी ने पति के साथ काटों के पथ को अपना जीवन समझा और चरित्र परीक्षा के लिए अग्नि का आलिंगन किया उस देवी स्त्री को एक धोबी के प्रश्न खड़े करने पर घर से निकलने के लिए कहनेवाले काहें के मर्यादा पुरुषोत्तम?

टिप्पणियाँ

  1. इस व्यंग्य पर कोई भी टिप्पणी ना देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। अंधभक्ति से परिपूर्ण भारतीय समाज में भगवान के अस्तित्व एवं चरित्र पर प्रश्न उठाने का साहस कोई करना ही नहीं चाहता है।

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