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#व्यंग्य - समाज की परवाह करने वाले कैसे संत?

प्यारी अपने कमरे में बैठी थी की तभी द्वार पर एक सन्यासी संत ने, "भिच्छाम देहि।भिच्छाम देहि।" का अनुमोदन किया। प्यारी के दोनों नौकर किसी काम से बाहर गए थे। संत की आवाज सुनते ही प्यारी दरवाजे पर पहुँच गई और संत बाबा के चरण स्पर्श करने के लिए झुक गई। बाबा ने प्यारी को आशीर्वाद देते हुए कहा, "बेटी तुम्हारा नाम क्या है?" प्यारी ने जवाब देते हुए कहा,"राजलक्ष्मी।" बाबा ने प्यारी से कहा,"बड़ा सुंदर नाम है। यदि तुम्हे कोई आपत्ति न हो तो हरिद्वार की यात्रा करने से पहले में यहाँ दो तीन दिन आराम करना चाहता हूँ।"
बाबा की बात सुनकर प्यारी को थोड़ा संकोच हुआ परंतु उसने अपने संकोच को अपने चेहरे के घूंघट में छिपाते हुए बाबा को उत्तर दिया,"बाबा जी यह तो मेरा सौभग्य है।"
प्यारी और बाबा के बीच बातों का दौर आगे बढ़ता इससे पहले प्यारी के दोनों नौकर हाथ में तबला और ढोल लेकर हाजिर हो गए। बाबा ने उन्हें देखकर कहा,"हरी ॐ, आप लोगों ने भजन का प्रयोजन भी कर दिया।"
सन्यासी बाबा के लिए नीचे का एक कमरा साफ सुथरा कर दिया गया। एक नई दरी बिछाकर बाबा के सम्मान में फल-फूल का इंतजाम कर दिया गया।
अपनी आवभागत से खुश होकर बाबा ने राजलक्ष्मी को दीक्षा देने का निर्णय लिया। राजलक्ष्मी दीक्षा की बात से बहुत खुश हुई परंतु वो अभी चाहकर भी नाचने-गाने का व्यापार नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि उसे अभी अपने मुँह बोले बेटे की तीन बहनों का विवाह करना था।
राजलक्ष्मी ने दीक्षा लेने के बारे में बहुत विचार किया। मन ही मन विचार किया कि यदि श्रीकांत आज यहाँ होते तो सामस्य बताकर उनसे हल मांग लेती परंतु वो तो अपने जीवन में इतने व्यस्त हैं कि कई महीनों से पत्र नहीं भी लिखा।
अपने गहनों और धन का आकलन कर के प्यारी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया।
बाबा जी दीक्षा देने के लिए तैयार, हवन कुंड के सामने बैठे थे। प्यारी ने गेरुवा वस्त्र धारण किया था।
यज्ञ कुंड के धुएँ से वातावरण पवित्र हो रहा था कि तभी ठाकुर साहब वहाँ आ पहुँचे। संत बाबा कुछ दिन पहले ठाकुर साहब के वहाँ भी हो आये थे। देखते ही उन्हें पहचान गए। ठाकुर साहब ने बाबा के कान में कुछ कहा, जिसके बाद बाबा क्रोधित हो गए।
बाबा को इस बात की सच्चाई पता चल गई थी की राजलक्ष्मी का नाम प्यारी बाई है और वो नाचने-गाने का काम करती है। बाबा ने तुरंत पानी के छीटें मारकर यज्ञ की आग को स्वाहा कर दिया। प्यारी को उन्होंने वैश्या, रंडी और कई शब्दों से संबोधित करते हुए, वहाँ से ठाकुर साहब के साथ निकल गए।
बाबा के आचरण को देख राजलक्ष्मी ने मन ही मन विचार किया इस संत बाबा से यदि दीक्षा लेती तो इस लोक के साथ - साथ परलोक भी बिगड़ जाता।

(शरतचंद्र के उपन्यास श्रीकांत के एक कहानी से प्रेरित)

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2 टिप्‍पणियां:

  1. सौभाग्य कर ले सौभग्य को । सुन्दर प्रस्तुति ।

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  2. As usual amazing article .... really fantastic .... Thanks for sharing this!! :) :)

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