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लंकापति का लोकतंत्र

रावण अपनी जिंदगी के उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां उसके पास सब कुछ था। वो खुश भी था लेकिन खुशी तो किसी के साथ भी बहुत दिन तक नहीं रहती है तो  रावण भी कैसे लंबे समय तक खुश रहता , मामा मारीच ने रावण को बताया कि उसे किसी भी तरह से नॉबेल पुरस्कार पाना चाहिए, इससे पृथ्वीलोक से लेकर नरकलोक तक सभी उसकी इज्जत करेंगे।

रावण ने नॉबेल पुरस्कार पाने के चक्कर में लंका को लोकतंत्र घोषित करके वहां चुनाव करवाने और स्वयं चुनाव ना लड़ने का  ऐलान कर दिया। चुनाव में विभीषण की विजय हुई और रावण को कई बड़े अखबारों ने लंका के लोकतंत्र निर्माण के लिए धन्यवाद दिया।

चुनाव के कुछ महीनों में ही रावण को इस बात का भान हो गया कि पश्चिम देशों से पुरस्कार पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। दूसरी तरफ लंका सरकार से मिलनेवाले भत्ते से रावण का गुजारा और अशोक वाटिका का रखरखाव करना कठिन होता जा रहा था। कोलगेट घोटाले के बाद रावण ने भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया और कलयुग में सेक्युलर सर्टिफिकेट लेने आया और खाली हाथ लौट गया।

चुनाव में रावण ने विभीषण को भारी मतो से पराजित किया और उसके बाद आरंभ हुआ रावण के रामराज्य लाने का सिलसिला। जहां मिग विमान घोटाले से लेकर लंका में गरीबी कम करने तक के कई पैतरें रावण और उसके मंत्रिमंडल ने उठाए। इन्हीं पैतरों और रावण के राजनैतिक करियर पर आधारित है लंकापति की लोकतंत्र।

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टिप्पणियाँ

  1. चलो एक बात तो पता चली कि पुरानी बस्ती का चिट्ठाकार कमल उपाध्याय है ।

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