#कविता - अक्षरों में खोई नज्म

नज्म एक लिखी,
कई बार मिटाई,
क से ज्ञ तक अक्षर हैं परेशान,
पूछते हैं,
क्या लिखना चाहते हो शायर?

अब क्या बताऊँ उन्हें,
अपने मिश्रे सुलझा रहा हूँ,
लिखकर मिटाना नही आता मुझे,
मिटाकर अक्षरों के दाब बना रहा हूँ,

वो नज्म जो 
उस रात सपने में आई थी,
अलफ़ाज़ो से लबरेज थी
और लज्जत ऐसी जैसे पान में लगा किमाम।

खो गई है नज्म मेरी,
अक्षरों ने उसे घेर रखा है,
मैं तो इतना कहूँगा,
सुनो अक्षरों जो परेशान हो तो,
लौटा दो मुझे मेरी नज्म।



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