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#कविता - छोटी इमारत

कल एक छोटी इमारत को
अपना हाले दिल बयान करते देखा।

गुरुर था मुझे कुछ सदियों पहले,
अपने सबसे ऊंची होनेपर,
दूर तलक देखती थी,
बिना किसी रोक टोक के,
वो मेरे चारों तरफ लगे बड़े बड़े शीशे की खिड़किया,
चौंधिया देती राहगीरों को,
जब वो नजर उठाकर मेरी तरफ देखते।

संगमरमर से बने मेरे जीने
लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करतें,
परसियन स्टाईल का बना झरोखा
तरोताजा करता रहता था अंदर रहनेवालों को।

कुछ दिन पहले खड़ी हुई है
एक नई इमारत,
या यो कह दू बड़ी इमारत,
मुझसे कई मंजिल ऊंची,
दिन में यदि दो बार भी
उसकी ऊँचाई देख लू,
तो मचक जाती है गर्दन मेरी।

उसके चारों तरफ सिर्फ शीशे ही शीशे हैं,
राहगीर बताते हैं
कुछ बड़े बड़े हिलते कमरे
लोगों को ऊपर नीचे ले जाते हैं,
उसपर खड़े होकर देखने पर
मेरा वजूद ऐसा कि कोई रेंगता कीड़ा।

वो बड़ा साहब
जो कभी मेरी तारीफ में थकता नही था।
अब उसने भी वहाँ अपना नया घर बना लिया है।
अब मेरे सौंदर्य की तुलना भी 
संकीर्ण लगती है लोगों को।
मेरा वजूद आज भी है
लेकिन लोगों ने देखने से कर दिया इनकार।

मैं बड़ी इमारत 
अब छोटी ईमारत हो गई ।

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