badge पुरानीबस्ती : #कविता - लगता है फिर कोई त्यौहार आया है
चाँद भी कंबल ओढ़े निकला था,सितारे ठिठुर रहें थे,सर्दी बढ़ रही थी,ठंड से बचने के लिए, मुझे भी कुछ रिश्ते जलाने पड़े।

Monday, October 10, 2016

#कविता - लगता है फिर कोई त्यौहार आया है


लड़िया सज रही है सड़को पर,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

भूखे बच्चे बेचते समान,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

रंगदार बाजार से चंदा ले रहे हैं,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

डाकिया घर घर फिर रहा है,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

मातम छिप गया है उजालों में,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

माँ तक रही रस्ता बच्चों के आने का,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,

सिसकियाँ ले रहा हूँ कोने में,
लगता है फिर कोई त्यौहार आया है,



2 comments:

  1. वाकई एक बेहतरीन रचना है ! आनन्द आया !

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